श्रील परमगुरुदेव की मातृश्री श्रीयुक्ता शैवालिनी देवी
श्रीचैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव स्थान श्रीधाम मायापुर अंतर्गत इशोद्यान में उनका अंतिम कृत्य किया गया। परमाराध्यतम श्री श्रील प्रभुपाद के चरणों का आश्रय ग्रहण करने के बाद उनके कृपा-आदेश का पालन करते हुए उन्होंने श्रीधाम मायापुर स्थित योगपीठ में श्रीगौरांग एवं विष्णुप्रिया देवी की सेवा में स्वयं को समर्पित करके विष्णुप्रिया पल्ली में कई वर्षों तक वास किया। वे विशेष रूप से श्रीमन महाप्रभु की सेवा के लिए विभिन्न प्रकार के भोग बनाने में निपुण थीं। अत्यंत वृद्धावस्था की लीला में भी, अत्यधिक शारीरिक कष्टों को स्वीकार करते हुए, उन्होंने भारत के कई तीर्थ स्थानों में भ्रमण किया और कुछ समय के लिए एकांत भाव से श्रीहरिनाम का आश्रय करके उन्होंने श्रीधाम वृंदावन में वास किया। तीर्थों में साधुसंग में वास करते समय वृद्धावस्था के कारण उनको हो रहे शारीरिक कष्ट को देखते हुए उनके परिवार वालों ने उनकी सेवा करने के उद्देश्य से उनको अपने साथ घर ले जाने की बहुत चेष्टा की किन्तु वे साधुसंग में रहकर हरिकथा श्रवण करने के सुयोग को त्यागकर उन लोगों के साथ घर जाने के लिए सम्मत नहीं हुई।
वे श्री श्रील प्रभुपाद के चरणाश्रित सभी वैष्णवों का विशेष सम्मान और श्रद्धा करती थीं। श्रीहरि-गुरु-वैष्णवों के प्रति उनकी आदर्श भक्ति और सेवा को देखकर अनेक ज्येष्ठ त्रिदंडीयति भी उन्हें विशेष सम्मान और मर्यादा देते थे। श्रीचैतन्य गौड़िय मठ के आश्रित भक्तों के प्रति उनको विशेष स्नेह था।
यह रत्ना-गर्भा जननी, श्रीयुक्ता शैवालिनी देवी धन्य हैं, जिनके गर्भ रूपी समुद्र में श्री चैतन्य गौड़ीय मठाध्यक्ष त्रिदंडीस्वामी श्री श्रीमद भक्तिदयित माधव महाराज आविर्भूत हुए।
गत 6 पोष, 24 दिसम्बर सोमवार को उनके दो गृहस्थाश्रमी पुत्र, श्रीकामाख्याचरण बन्दोपाध्याय (वकील, आलीपुर) एवं श्रीकालिदास बन्दोपाध्याय (Intermetric officer) ने 35, सतीश मुखर्जी रोड़ स्थित श्री चैतन्य गौड़िय मठ में श्री श्रीमद भक्तिप्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज के पौरोहित्य में वैष्णव-स्मृति विधानुसार उनका परलौकिक कृत्य संपन्न किया। उक्त उत्सव के अवसर पर उस दिन मठ में लगभग दो हजार नर-नारियों को चार प्रकार के रस युक्त विभिन्न महाप्रसाद का परिवेशन किया गया।
एकमात्र-पारमार्थिक मासिक, श्रीचैतन्य वाणी, माघ-1369, 11 संख्या, अंग्रेजी 1963, पृष्ठ-संख्या 255-256.